Fulchand Shastri
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Dravya Drishti Prakash

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16/25/2026अपरिणामी का ज़ोर‘परिणाम योग्यता अनुसार हो जाता है; मैं वो नहीं ।’—इसमें किसी को ऐसा लगे कि, क्या परिणाम जड़ में होता है? अथवा निश्चयाभास-सा लगता है। लेकिन ऐसा कहने में तो ‘अपरिणामी’ का ज़ोर बताना है। १.
26/26/2026शुद्धपर्याय भी दृष्टिअगोचरप्रश्न : आप शुद्धपर्याय को दृष्टि की अपेक्षा से भिन्न कहते हैं या ज्ञान की अपेक्षा से? उत्तर : दृष्टि की अपेक्षा से भिन्न कहते हैं; ज्ञान की अपेक्षा से नहीं। दृष्टि करने के प्रयोजन में भिन्नता का ज़ोर दिए बिना दृष्टि अभेद नहीं होती; इसलिए दृष्टि की अपेक्षा से ही भिन्न कहते हैं। और अपनी तो यही “दृष्टिप्रधान” शैली है, सो ऐसे ही कहते हैं। २.
36/27/2026ज्ञानी का सहज प्रमाण ज्ञाननिर्विकल्प होते ही अपने में से ही एक ज्ञान उघड़ता है, जो दोनों पक्षों को सहज जान लेता है, उसी को प्रमाणज्ञान कहते हैं। ।।3।।
46/28/2026परिणाम और त्रिकाल अपरिणामी‘परिणाम’ और ‘त्रिकाल अपरिणामी’—दो मिलकर ही पूर्ण एक वस्तु है, जो प्रमाण का विषय है। वेदान्ती तो केवल निष्क्रिय… निष्क्रिय कहते हैं, वे परिणाम को ही नहीं मानते हैं; तो निष्क्रिय भी जैसा है वैसा तो उनकी मान्यता में भी नहीं आता। यहाँ तो परिणाम को गौण करके निष्क्रिय कहा जाता है। ।।4।।
56/29/2026नयचक्र चलाकर अखंड को जीतएक चक्र के अनेक पासे (पहल) हैं, सभी पासे अलग-अलग डिजाइन के हैं। जब किसी एक पासे की बात चलती हो, तब दूसरे पासे की बात नहीं समझनी चाहिए। ऐसे वस्तु के अनेक धर्मों में से भिन्न-भिन्न धर्मों की बात चलती हो, तब एक को दूसरे में मिलाकर, घोटाला नहीं करना चाहिए। ।।5।।
66/30/2026बहिर्तत्त्व से अंतःतत्त्व"जब शुद्धपर्याय बहिर्तत्त्व है, ध्यान बहिर्तत्त्व है, तब ध्रुवतत्त्व अंतःतत्त्व है। जब दो घर की बात चलती हो, तब उसमें तीसरे घर की टाँग (बात) डालने से घोटाला हो जाता है। ध्रुवतत्त्व अंतःतत्त्व है, तब शुद्धपर्याय बहिर्तत्त्व है। शुद्धपर्याय को अंतःतत्त्व कहें, तब अशुद्धपर्याय को बहिर्तत्त्व कहते हैं। अशुद्धपर्याय को अंतःतत्त्व कहें, तब कर्म को बहिर्तत्त्व कहते हैं। कर्म को अंतःतत्त्व कहें, तब नोकर्म को बहिर्तत्त्व कहते हैं। — ऐसे (अपेक्षित विवक्षानुसार) सब घटा (समझ) लेना। ६."
77/1/2026सिद्धों का भी मैं सिद्धसिद्ध से भी मैं अधिक हूँ; क्योंकि सिद्ध तो एक समय की पर्याय है; और मैं तो ऐसी-ऐसी अनन्त पर्यायों का पिण्ड हूँ। ७.
87/2/2026अड़िग चैतन्य मेरुजैसे मेरुपर्वत अड़िग है; मैं भी वैसे-ही अड़िग हूँ। मेरु में तो परमाणु आते-जाते हैं; लेकिन मेरे में तो कुछ-भी आता-जाता नहीं—ऐसा मैं अड़िग हूँ। ८।
97/3/2026आनंद से भरचक समुद्र"‘मैं वर्तमान में ही मुक्त हूँ, आनंद की मूर्ति हूँ, आनंद से भरचक समुद्र ही हूँ’—ऐसी दृष्टि हो, तो फिर मोक्ष से भी प्रयोजन नहीं; मोक्ष हो तो हो, न हो तो भी क्या? मेरे को तो वर्तमान में ही आनंद आ रहा है, फिर पर्याय में तो मोक्ष होगा ही। लेकिन मेरे को तो उससे भी प्रयोजन नहीं। ९।"
107/4/2026बहिर्मुख परिणाम से दुःख"कुछ करना, सो मरने बराबर है। मुझे शुरू से ही कुछ करने के भाव में मरने जैसा बोझा लगता था। शुभपरिणाम होते (तो) मैं भट्ठी में जल रहा हूँ—ऐसा लगता था। समुद्र के जल में से एक बूँद उड़कर बाहर पड़े, तो उस बूँद को रेत चूस कर खत्म कर देगी; और यदि गर्म रेत हो, तो बूँद तुरत खत्म हो जावेगी। वैसे-ही परिणाम बाहर की ओर जाए (तो) उसमें दुःख ही दुःख है। (अंगत) १०।"
117/5/2026शुद्धपर्याय भी परद्रव्यद्रव्यदृष्टि की अपेक्षा से तो शुद्धपर्याय भी परद्रव्य है। जब मेरे अस्तित्व में वो (शुद्धपर्याय) नहीं, तो फिर राग की तो बात ही क्या? ॥११॥
127/6/2026वैसा का वैसा मैं अपीरणामीपर्याय में तीव्र अशुभपरिणाम हो या उत्कृष्ट से उत्कृष्ट शुद्धपर्याय हो, मेरे में कुछ-भी बिगाड़ सुधार नहीं होता, मैं तो वैसा का वैसा ही हूँ। ॥१२॥
137/7/2026मोक्ष से भी प्रयोजन नहींकेवलज्ञान से भी हमारे प्रयोजन नहीं; मोक्ष से भी प्रयोजन नहीं; वो तो हो ही जाता है। ॥१३॥
147/8/2026ज्ञान के विषय का प्रयोजनज्ञान का विषय दृष्टि के विषय का प्रयोजन साधने जितना-ही लक्ष्य में लेना ठीक है; बाकी उसका प्रयोजन नहीं है। ॥१४॥
157/9/2026सुनना-पढ़ना भी तब बेकार हैसुन-सुन करके मिल जाएगा, यह दृष्टि झूठी है। (कार्यसिद्धि) अपने से ही होगी। सुनना, सुनाना, पढ़ना—ये सभी बेकार हैं; ये हों, तो भले हों; लेकिन उनका खेद होना चाहिए, निषेध आना चाहिए। ॥१५॥
167/10/2026वायदे में फायदा नहींमैं पहले तो सब सुन लूँ, जान लूँ, पीछे पुरुषार्थ करूँगा—ऐसे पीछेवाले सदा पीछे-पीछे ही रहेंगे। यहाँ तो वर्तमान इसी क्षण से ही करने की बात है। ॥१६॥
177/11/2026परिणाम मात्र अभूतार्थ हैव्यवहारनय को अभूतार्थ कहने से संक्षेप में परिणाम मात्र अभूतार्थ है—ऐसा कहा है; चाहे तो परिणाम अशुभ हो, शुभ हो या शुद्ध हो। ॥१७॥
187/12/2026अपने परिणाम तक अपनी सीमाअपने परिणाम तक ही अपनी सीमा है; इससे आगे तो कोई द्रव्य जा ही नहीं सकता। १८।
197/13/2026शुद्ध परिणाम भी मुझसे अलगपरिणाम अपना है; तो भी उसको आप खुद ही पलट नहीं सकते। परिणाम में कर्ता-कर्मपने का धर्म है, इसलिए वो तो पलटेगा ही। जब दृष्टि बाहर झुकी है, दृष्टि का प्रसार अपने को छोड़कर बाहर में है, तो परिणाम भी बाहर झुकेगा। और यदि दृष्टि अपने स्वभाव की ओर है, तो परिणाम भी अपनी ओर झुकेगा। अपने को तो परिणाम भी पलटाना नहीं है। मैं अपरिणामी हूँ और पलटना मेरा धर्म ही नहीं है, वह तो परिणाम का धर्म है। दृष्टि की अपेक्षा से शुद्ध परिणाम भी मेरे से अलग ही है; ज्ञान उसको अपना अंश जान लेता है। १९।
207/14/2026पात्रता का स्वरूपप्रश्न : प्रथम पात्रता का क्या स्वरूप है? उत्तर : अपने द्रव्य में दृष्टि को तादात्म्य करना, प्रसारना। बाह्य में तादात्म्य कर रही दृष्टि को अपने में तादात्म्य करना, यही प्रथम पात्रता है। २०।
217/15/2026एक बार आनंद की घूँट पी लेजब एक बार आनंद की घूँट पी ली, तब तो बार-बार वही घूँट पीने के लिए अपनी ओर आना ही पड़ेगा। दूसरी किसी जगह परिणति को रस ही नहीं आएगा; बार-बार अपनी ओर आने का ही लक्ष्य रहेगा, दूसरे सब रस उड़ जाएँगे। २१।
227/16/2026अनंत पुरुषार्थ का पिण्ड‘पुरुषार्थ करूँ....पुरुषार्थ करूँ’—यह बात भी नहीं है। ‘मैं वर्तमान में ही अनंत पुरुषार्थ का पिण्ड हूँ’ (—ऐसे स्वाश्रय में) पर्याय द्रव्य की ओर ढल जाती है। इसलिए पर्याय की अपेक्षा से पुरुषार्थ करने का कथन आता है। २२.
237/17/2026भगवान होना नहीं भगवान हूँ‘मैं स्वयम् ही वर्तमान में भगवान हूँ’—भगवान होना भी क्या है? अपने स्वभाव में दृष्टि का प्रसार होते, पर्याय मेरी ओर झुकते-झुकते, पर्याय में केवलज्ञान–सिद्धदशादि होती ही हैं; परंतु मुझे तो इससे भी प्रयोजन नहीं है। २३.
247/18/20262424
257/19/20262525
267/20/20262626
277/21/20262727
287/22/20262828
297/23/20262929
307/24/202630
317/25/20263131
327/26/202632दृष्टि का विषयभूत द्रव्य एकांत ध्रुव ही है। पर्याय की अपेक्षा से पर्याय एकांत अनित्य ही है। ॥३२॥
337/27/202633प्रश्न : निर्विकल्प उपयोग में कैसा आनंद आता है? उत्तर : निर्विकल्प उपयोग के सुख की तो क्या बात कहें!! लेकिन समझाने के तौर-से जैसे गन्ने के रस की घूँट पीते हैं, वैसे आनंद की घूँट एक के बाद एक चलती ही रहती है; उसमें से निकलने का भाव ही नहीं आता। ॥३३॥
347/28/202634अशुभपरिणाम के काल में इस ओर का झुकाव मंद होता है। शुभपरिणाम के काल में इस ओर का थोड़ा ज्यादा झुकाव होता है। दृष्टि का झुकाव तो वैसा का वैसा ही है। लड़ाई के काल में बाहर लड़ाई की क्रिया होती है और राग में अशुभराग की क्रिया होती है; पर मैं तो मेरे में ही अचल रहता हूँ, मेरे में तो उस समय भी राग की क्रिया का अभाव है। ॥३४॥
357/29/202635"मैं अडिग हूँ, किसी से डिगनेवाला नहीं हूँ" — ऐसा निश्चय होने पर, निर्णय का फल आनंद आना चाहिए; तब ही निर्णय सच्चा है। ॥३५॥
367/30/202636हर समय विकल्प से भेदज्ञान करना नहीं पड़ता, वो तो सहजरूप से हो जाता है। ॥३६॥
377/31/202637दृष्टि द्रव्य में तादात्म्य हो जाने पर भी चारित्रपरिणति कुछ च्युत होकर पर की ओर चली जाती है, तो भी स्वरूपाचरण की च्युति नहीं होती। ॥३७॥
388/1/202638(स्वरूप की) दृष्टि होनेपर भी चारित्रगुण की योग्यता ही ऐसी होने से चारित्रगुण पूरा (शुद्ध) नहीं परिणम जाता। श्रद्धागुण का स्वभाव ऐसा है कि एक ही क्षण में द्रव्य में पूरा का पूरा व्याप्त हो जाता है। चारित्रगुण का स्वभाव ऐसा है कि वह क्रम-क्रम से ही पूरा होता है—ऐसे दोनों गुणों के स्वभाव ही अलग-अलग हैं। ॥३८॥
398/2/202629जब दृष्टि अपने स्वरूप में तादात्म्य होती है तो थोड़े काल तक राग आता तो है, लेकिन वह लँगड़ा हो जाता है, उसको आधार नहीं रहता। ॥३९॥
408/3/202640मैं तो कभी-भी नहीं हिलनेवाला खूँटा हूँ। परिणाम आते हैं और जाते हैं, मगर मैं तो खूँटे की तरह अचलित ही रहता हूँ। ॥४०॥
418/4/202641बहिर्मुख होने से ज्ञान खिलता नहीं और अंतर्मुख होने से भीतर से ही केवलज्ञान प्रकट हो जाता है। अपनी ओर ही देखने की बात है। ॥४१॥
428/5/202642(एक जिज्ञासु :) आत्मा को ही पकड़ने की बात है? (भाईश्री :) पकड़ना क्या? "मैं तो स्वयं हूँ ही।" पकड़ना-फकड़ना सब परिणाम की अपेक्षा से कहने में आता है। परिणाम अपनी ओर झुका, तो परिणाम की अपेक्षा से आत्मा को पकड़ा—ऐसा कहने में आता है। ॥४२॥
438/6/202643अपने द्रव्य में दृष्टि तादात्म्य होते ही ज्ञान प्रमाण हो जाता है; तब ज्ञान सभी बातें (यथार्थपने से) जान लेता है। ॥४३॥
448/7/202644जब अपनी ओर से खिसक कर बाहर जाने का ही निषेध है, तो अशुभ में जाकर पर में रस पड़ जावे तब तो दृष्टि अपने द्रव्य में रही ही कहाँ?—वह तो पर में चली गई। ॥४४॥
458/8/202645“अनेकांत पण सम्यक् एकांत ऐवा निजपदनी प्राप्ति सिवाय अन्य हेतुए उपकारी नथी” — श्रीमद्जी का यह वाक्य मुझे बहुत प्रिय लगता है। ॥४५॥
468/9/202646दूसरे से सुनना-माँगना सब पामरता है, दीनता है, भिखारीपना है। मेरे में क्या कमी है, जो मैं दूसरे से माँगूँ?? मैं तो स्वयं ही परिपूर्ण हूँ। ४६.
478/10/202647“अहो! जे भावे तीर्थंकरगोत्र बंधाय ते भाव पण नुकसान कर्ता छे”-- यह बात कहने की किसकी ताकत है? - यह तो गुरुदेवश्री की ही सामर्थ्य है! ४७.
488/11/202648तीर्थंकर की दिव्यध्वनि से भी लाभ नहीं होता, तो फिर और किससे लाभ हो ? वह भी अपने को छोड़कर, एक भिन्न विषय ही है। ४८.
498/12/202649विकल्प से और मन से किया हुआ निर्णय सच्चा नहीं। अपनी ओर दृष्टि को तादात्म्य करनेपर ही अपने से किया हुआ निर्णय सच्चा होता है। पहले विकल्प से-अनुमान से निर्णय हो, उसमें भी लक्ष्य तो अंतर में ढलने का ही होना चाहिए। ४९.
508/13/202650मैं तो अडिग हूँ, किसी से डिगनेवाला नहीं हूँ। जैसे इस देहाकार में स्थित आकाश अडिग है, हिलता-चलता नहीं; वैसे-ही मैं भी अडिग हूँ। ५०.
518/14/202651अंतर में आनंद की घूँट पीते हुए बाहर में आना गमे (रुचे) ही किसको ?? बाहर में आते-ही तो बोझा लगता है। ५१.
528/15/2026Giveप्रश्न : चतुर्थ गुणस्थान में अनुभव कितने समय के अंतराल में होता होगा ? उत्तर : ऐसे अनुभव के अंतराल की कोई मर्यादा नहीं है। वह तो यदि विशेष अशुभ में हों, तो (सामान्यतया) अंतराल लम्बा भी हो जाए, और शुभ में हों, तो जल्दी-जल्दी भी अनुभव होवे। किसी को महीने में दस बार भी हो। ५२.
538/16/2026ढ़Give‘चैतन्य गठरी मैं ही हूँ’—ऐसी पकड़ हो जाने से मति-श्रुतज्ञान अंतर में ढ़ल जाता है; इसलिए अंतर में ढ़लने के लिए कहने में आता है। ५३.
548/17/2026gमैं वर्तमान में ही समझण का पिण्ड हूँ। ५४.
558/18/2026gसम्यग्दृष्टि को दुःख का वेदन होता है लेकिन अपने स्वभाव की अधिकता के वेदन में, उस वेदन की गौणता हो जाती है। ज्ञान में शांति के वेदन के साथ-साथ दुःख का वेदन आता है परंतु वह वेदन मुख्य नहीं होता। ज्ञानी को अपने स्वभाव की ही अधिकता रहती है, अपने स्वभाव की अधिकता कभी नहीं छूटती। ५५.
568/19/2026gजब दृष्टि अपने स्वभाव में प्रसर जाती है, तब पाँचों समवाय अपने ज्ञान में ज्ञेय हो जाते हैं। ५६.
578/20/2026gअज्ञानी उत्पाद-व्यय के साथ-साथ चलता जाता है परंतु ज्ञानी ने नित्य में अपना अस्तित्व स्थापित किया है अतः वह उत्पाद-व्यय के साथ नहीं चला जाता, किंतु उत्पाद-व्यय को जान लेता है। ५७.
588/21/2026gज्ञान की पर्याय आती है अंदर से। परंतु (अज्ञानी को) बाहर का लक्ष्य होने से ऐसा दिखता है कि मानो पर्याय बाहर से आती हो, इसलिए अज्ञानी को पर से ज्ञान होता है ऐसा भ्रम हो जाता है। ५८.
598/22/2026gअनंत तीर्थंकर हो गए, लेकिन अपने तो गुरुदेवश्री ही सब से अधिक हैं। जैसे कि : अपने को धन की जरूरत हो और कोई लखपति अपनी जरूरत-अनुसार धन दे देवे, तो वह अपने लिए तो अन्य करोड़पति से भी अधिक है। ऐसे ही, गुरुदेवश्री अपने लिए तो तीर्थंकर से भी अधिक हैं, अपना हित तो इनसे हुआ है। (अंगत) ५९।
608/23/2026ggद्रव्यलिंगी होकर ग्यारह अंग तक पढ़ लेते हैं, परंतु त्रिकाली चैतन्यदल में अपनापन स्थापित नहीं करते;—यही भूल है, दूसरी कोई भूल नहीं। ६०।
618/24/2026gपू. गुरुदेवश्री ने शास्त्र पढ़ते समय कहा कि : जैसे व्यापार में बही के पन्ने फेरते हैं वैसे-ही ये पन्ने हैं, कोई फर्क नहीं; यदि इधर की दृष्टि नहीं, तो दोनों समान हैं। ६१।
628/25/2026gतीर्थंकर-योग और वाणी मिली, तो ठीक है, भविष्य में भी इसी भाव से मिलेगी—ऐसे उसमें हौंस (उत्साह-रस) आता है, तो उससे कैसे छूटेगा? लाभ मानता है, तो कैसे छोड़ेगा? इससे (ऐसे भाव से) नुकसान ही है, लाभ नहीं। लाभ तो अपने से ही है, वर्तमान से ही खुद से लाभ है—ऐसा जोर न होवे, तो पर में अटक जाएगा। ६२।
638/26/2026gप्रश्न : आत्मानुभव होने के बाद ज्ञानीजीव न्याय-नीति से धनादि की प्रवृत्ति करते हैं न ? उत्तर : करना-धरना नहीं रहा। जो पर्याय आनेवाली है, वह योग्यतानुसार आ जाती है। परंतु उधर उसका लक्ष्य नहीं, लक्ष्य तो इधर का है। अंतर में एकत्व हुआ, तो परिणाम मर्यादित हो जाते हैं। लेकिन मर्यादित ही होता है....होता है—ऐसा कहने से, उसकी दृष्टि में परिणाम को मर्यादा में रखने का ही प्रयत्न रहता है, अर्थात् परिणाम को ही देखता रहता है; और परिणाम की मर्यादा को देखते रहने से अपरिणामी का ज़ोर छूट जाता है। इसी लिए कहते हैं कि : जो परिणाम होनेवाला है, वो हो जाता है। ६३।
648/27/2026gतीव्र प्यास (जिज्ञासा) लगनी चाहिए। प्यास लगे, तो जैसे-तैसे बुझाने का प्रयत्न किए बिना रहे ही नहीं। ६४।
658/28/2026gप्रश्न : अनुभव के लिए विचार-मनन-धूँटण में रहना चाहिए ? उत्तर : पर्याय में बैठकर (—पर्याय में ‘मैं-पना’ रखकर अर्थात् पर्याय में अस्तित्व की स्थापना करके) धूँटण-मनन करने में पर्याय में ठीकपना (संतोष) रहता है। और द्रव्य में बैठने से (—द्रव्य में अस्तित्व स्थापित करने से) धूँटण-मनन सहज होता है; धूँटण आदि में ज़ोर नहीं रहता, सहज होता है; ज़ोर तो इधर का रहता है। पर्याय में बैठकर धूँटण आदि करने से अंदर में नहीं आ सकते। ६५।
668/29/2026gमुझे पहले से इन्द्रियविषयों की ओर का रस नहीं था और विकल्पों में कषाय की भट्ठी जलती हो ऐसा लगता था; ऐसे वेदन में ‘वो क्या है.....क्या है’ ऐसे विचारों की धुन में रहता था; मुझे शहर के ख़ास व परिचित रास्तों के अलावा किसी रास्ते आदि का पता नहीं था और कोई बात का ख़याल नहीं रहता था। विचार का ज़ोर पहले से ही था, उसमें तीक्ष्णता थी। दिगम्बरशास्त्र देखे, तो इधर से निकला और उधर क्रियाकाण्ड में पड़ा, परंतु उसमें भी कोई शांति नहीं मिली, वह भी छोड़ दिया। पीछे ‘आत्मधर्म’ देखते-ही चोट लगी और सब बात ख़याल में आने लगी। (अंगत)। ६६।
678/30/2026gसब बात का मसाला गुरुदेवश्री ने तैयार कर रखा है; जिससे कोई बात विचारनी नहीं पड़ती। नहीं तो, साधक हो फिर भी (उसे) मसाला तैयार करना पड़ता है। ६७।
688/31/2026gप्रश्न : अनुभव होने के बाद परिणाम में मर्यादा आ जाती है न? विवेक हो जाता है न? उत्तर : विवेक की बात एक बाजू रखो; एक दफ़ा विवेक को छोड़ दो! परिणाम मात्र ही मैं नहीं। मैं तो अविचलित खूँटा हूँ। मेरे में क्षणिक अस्तित्व है ही नहीं। विवेक के बहाने भी जीव परिणाम में एकत्व करते हैं। ६८।
699/1/2026g(अज्ञानी) कषाय की मंदता में थोड़ा विषय छूटे, तो इसमें ठीक मानने लगते हैं; लेकिन वह भी तीव्र कषाय ही है, उसमें कषाय (रस) भरा पड़ा है। ६९।
709/2/2026gप्रश्न : शुरुआतवाले को अनुभव के लिए कैसे प्रयत्न करना ? उत्तर : मैं परिणाम मात्र नहीं हूँ। त्रिकाली-ध्रुवपने में अपनापन थाप देना, यही उपाय है। ७०।
719/3/2026gप्रश्न : शास्त्र में तो प्रयत्न करना.....प्रयत्न करना, ऐसी बात आती है ? उत्तर : प्रयत्न करने के लिए कहने में आता है; प्रयत्न होता भी है; लेकिन प्रयत्न भी तो पर्याय है। मैं तो पर्याय मात्र से भिन्न हूँ, प्रयत्न क्या करें? सहजरूप होता है। प्रयत्न आदि का होना पर्याय का स्वभाव है। मैं उसमें न आता हूँ, न जाता हूँ। ‘मैं त्रिकाली हूँ’—ऐसी दृष्टि में प्रयत्न सहज होता है। ७१।
729/4/2026gविचार-मंथन भी थक जाएँ, शून्य हो जाएँ तब अनुभव होता है। मंथन भी तो आकुलता है। एकदम तीव्र धगश से अंदर में उतर जाना चाहिए। ७२।
739/5/2026gप्रश्न : रामचंद्रजी को सीताजी के लिए लड़ने का भाव आया; परंतु धर्मराज (युधिष्ठिर) को द्रौपदी की साड़ी खींची जानेपर भी बचाने का भाव नहीं आया—इसका क्या कारण ? उत्तर : वह तो परिणामों की योग्यता ही ऐसी भिन्न-भिन्न होती है। अनेक प्रकार के कषायभावों में से जो होनेवाले हैं, वो होते हैं; उनको करें-छोड़ें क्या? सम्यग्दृष्टि को परिणाम मात्र से भिन्नता रहती है। ‘मैं करनेवाला ही नहीं हूँ’—ऐसा रहना ख़ास बात है। ७३।
749/6/2026gशास्त्र में परिणाम देखने की बात आती है, तो (अज्ञानी) परिणाम देखते रहते हैं; ध्रुववस्तु रह जाती है। परिणाम को ही देखते रहने में परिणाम के साथ एकता होती है, परिणामी में एकता नहीं रहती- अनित्य में नित्य चला जाता है। पर्याय की शुद्धि ऐसी है..... ऐसी है - ऐसे पर्याय की बात में रस पड़ जाने से नित्य का ज़ोर नहीं रहता; पर्याय में ज़ोर करने की तो आदत पड़ी ही है । ७४ ।
759/7/2026gआख़ी वस्तु (प्रमाण का विषय) बताने में नित्य और अनित्य बताने में आते हैं; इनमें अनित्य अंग दूसरे (द्रव्य) का नहीं है, ऐसा बताने के लिए है। परंतु दृष्टि का विषय तो 'नित्य' ही हूँ है, और 'अनित्य' मेरे से भिन्न ही है। उसका (उत्पाद-व्यय का) भाव और मेरा (ध्रुव का) भाव विरुद्ध है । ७५ ।
769/8/2026gशक्ति की तरफ़ देखे तो इतना भारी-भारी लगता है कि, सम्पूर्ण जगत् फिर जावे तो भी वह (अनंत शक्तियों का पिण्ड) नहीं फिर सकता है, ऐसा घनरूप है, उसमें कुछ विचलितता ही नहीं होती । ७६ ।
779/9/2026g(अज्ञानी) परिणाम में बैठकर शक्ति को देखता है : 'शक्ति ऐसी है.... ऐसी है।' उसमें तो देखनेवाला और शक्ति दो अलग- अलग चीज़ हो जाती हैं। जैसे दूसरा दूसरे की बात करता हो वैसा हो जाता है । ७७ ।
789/10/2026gदर्पण में जो पर्याय दिखती है, वह तो ऊपर-ऊपर है। अंदर में जो दल पड़ा है, वह तो जैसा का तैसा है, वह पर्यायरूप होता ही नहीं। — ऐसे त्रिकाली स्वभाव का दल वैसा का वैसा ही है, पर्याय में आता ही नहीं। । ७८.
799/11/2026gश्रद्धा में त्रिकालीपना आ गया, तो विकल्प से भिन्नता हो गई—वही मुक्ति है। चारित्र में मुक्ति हो जाएगी। । ७९.
809/12/2026gप्रश्न : वस्तुस्वभाव का लक्ष्य हो जानेपर कार्य होता ही है? उत्तर : लक्ष्य और उसका ध्येय दूसरा होने से वस्तु दूसरी दिखती है, अतः लक्ष्य की पर्याय से देखना नहीं है। ‘मैं ही स्वयम् वस्तु हूँ’—ऐसे देखने से लक्ष्य की पर्याय गौण हो जाती है, तो उस पर्याय पर वजन नहीं जाता, मुख्यता नहीं आती, उसमें मुख्यता तो त्रिकालीपने की रहती है। । ८०.
819/13/2026gबस! एक ही बात है कि ‘मैं त्रिकाली हूँ’ ऐसे जमे रहना चाहिए। पर्याय होनेवाली हो सो योग्यतानुसार हो जाती है, मैं उसमें नहीं जाता। क्षयोपशम हो, न हो; याद रहे, न रहे; परंतु असंख्य प्रदेश में, प्रदेश-प्रदेश में व्यापक हो जाना चाहिए । ८१.
829/14/2026gप्रश्न : भगवान् की वाणी बहुत ज़ोरदार होगी ? उत्तर : वाणी में क्या ज़ोर होता है? अपने में ज़ोर हो, तो वाणी में ज़ोर का आरोप देते हैं। ८२.
839/15/2026gद्रव्यलिंगी को त्रिकाली के प्रति उत्साह नहीं आता; उत्साह आता, तो 'त्रिकाली' हो जाता । ८३.
849/16/2026g'कुछ करे नहीं, तो गमे नहीं' ऐसी आदत हो गई है। लेकिन 'कुछ करे, तो गमे नहीं' ऐसा होना चाहिए । ८४.
859/17/2026g(आत्मा के लिए) रुचि की आवश्यकता चाहिए । दरकार होनी चाहिए । (विकल्पों से) थकावट होनी चाहिए । तीव्र प्यास (तालवेली) लगे, तो ढूँढ़े ही । ८५.
869/18/2026ggggजहाँ तक अंदर में (आत्मा में) डुबकी नहीं मारता, वहाँ तक प्रयत्न चालू रखना चाहिए । ८६.
879/19/2026gप्रश्न : रुचि बढ़ते-बढ़ते वस्तु की महत्ता बढ़ती जाती है और सुगमता भी ज़्यादा भासती है ? उत्तर : रुचि बढ़ती है, ऐसे लक्ष्य में भी पर्याय की महत्ता होती है। उसमें 'मैं-पना' दिखता है, तो त्रिकाली में नहीं जम सकते । यह तो विकल्पवाली रुचि है। 'मैं तो परिणाम मात्र से भिन्न हूँ' - ऐसे त्रिकाली का अनुभव होना, वो ही अभेद की रुचि है । ८७.
889/20/2026gकोई एकांत से वेदांत में खिंच नहीं जावे, इसलिए दोनों बातें बताई हैं। पर्याय दूसरे में नहीं होती, कार्य तो पर्याय में ही होता है; - ऐसा कहें, तो वहाँ चोंट जाते हैं - ऐसा तो है न ! ऐसा तो होना चाहिए न ! अरे भाई ! क्या होना चाहिए ? छोड़ दे सब बातें जानने की ! मैं तो त्रिकाली ही हूँ, उत्पाद-व्यय कुछ मेरे में हैं ही नहीं । ८८.
899/21/2026ggप्रश्न : शुरुआतवाला विचार में बैठता है, तो 'मैं ऐसा हूँ, मैं ऐसा हूँ' - ऐसा करता है, तो घण्टा-आधा घण्टा में थकान लगती है, सो क्यों ? उत्तर : विकल्प में तो थकान लगे ही न ! 'मैं ऐसा हूँ' -ऐसा अनुभव करने में शांति है । ८९.
909/22/2026ggएक ही 'मास्टर की' (Master key) है; सब बातों में, सभी शास्त्रों में एक ही 'सार' है : 'त्रिकालीपने में अपनापन जोड़ देना ।' ९०.
919/23/2026gआनंद के अनुभव में तो राग से भी भिन्न चैतन्य-गोला छुट्टा अकेला अनुभव में आता है, उसके आनंद की क्या बात करें !! अंदर से निकलना ही गमे नहीं, बाहर में आते ही भट्टी-भट्टी लगे । ९१.
929/24/2026gप्रश्न : पक्के निर्णय बिना, 'मैं शुद्ध हूँ, त्रिकाली हूँ, ध्रुव हूँ', ऐसे-ऐसे अनुभव का अभ्यास करें तो, अनुभव हो सकता है क्या ? उत्तर : नहीं । पक्का निर्णय नहीं, लेकिन यथार्थ निर्णय कहो । यथार्थ निर्णय होने के बाद ही निर्णय में पक्कापन होता है, फिर अनुभव होता है । ९२.
939/25/2026gप्रश्न : सामान्य का विचार तो ज्यादा चले नहीं और विशेष के विचार में तो निर्विकल्पता होती नहीं ? उत्तर : 'मैं शुद्ध हूँ, ऐसा हूँ' - ऐसे विकल्प करने की बात नहीं है। और विचार भी तो एक समय की पर्याय में होता है। यहाँ तो 'मैं ऐसा ही हूँ' - ऐसे त्रिकाली में अपनापन होकर, अनुभवपूर्वक परिणमन हो जाना चाहिए । विचार आदि तो पर्याय का स्वभाव होने से चलता ही है; परंतु ज़ोर ध्येय-स्वभाव की ओर रहता है, तो परिणति त्रिकाली की ओर ढल जाती है । ९३.
949/26/2026gचौथा गुणस्थानवाला जीव द्रव्यलिंग धारता है फिर भी स्थिरता कम है, और पँचम् गुणस्थानवाला अशुभ में विशेष हो फिर भी स्थिरता विशेष है। क्योंकि चौथे गुणस्थानवाले द्रव्यलिंगी को शुभभाव में रस अधिक है और बाह्य उपयोग भी अधिक है; जबकि पाँचवें गुणस्थानवाला अशुभभाव में अधिक होते हुए भी (उसे) अंतर में ढ़लन अधिक रहती है । ९४.
959/27/2026gप्रश्न : चौथे गुणस्थानवाले को वस्तु का अनुभव है और स्थिरता का प्रयत्न भी करता है फिर भी अनुभव में काल क्यों लगता है ? उत्तर : चारित्र की पर्याय में इतनी अस्थिरता है, पुरुषार्थ की कमी है; पर्याय की ऐसी योग्यता है; लेकिन दृष्टि में उसकी गौणता है। 'वर्तमान में ही पूर्ण हूँ' - इसमें पर्याय की कमती-बढ़ती गौण है । ९५.
969/28/2026gअज्ञानी पर्याय में ही अपनापन, संतोष, अधिकता आदि रखते हैं। पर्याय में उल्लास तो है न ! पर्याय में विशेषता तो है न ! पर्याय ने द्रव्य का माहात्म्य तो किया न ! पर्याय अंतर में तो ढलती है न ! - ऐसे-ऐसे किसी न किसी प्रकार से पर्याय में ही वज़न रखते हैं। लेकिन पर्याय से हटकर, 'मैं तो त्रिकालीदल जैसा का तैसा हूँ, परिणाम मात्र मेरे में नहीं है' -ऐसे ध्रुवपने में अधिकता नहीं थापते । कारण कि वेदन में तो पर्याय होती है, और द्रव्य तो अप्रकट है; अप्रकट को तो नहीं देखते हैं, पर्याय में ही अपनापन रखते हैं। लेकिन, यहाँ तो कोई भी पर्याय हो - सुख अनंत हो या ज्ञान अनंत हो या वीर्य अनंत हो - तो भी मुझे कुछ परवाह नहीं। मैं तो स्वभाव से सुखस्वरूप ही हूँ, ऐसे ध्रुव स्वभाव में ही अधिकपने का वेदन करने का है और शुद्धपर्यायों को भी गौण करना है, गौणपने वेदन करना है। ध्रुव वस्तु में 'मैं-पना' स्थापित किए बिना, पर्याय से एकत्व नहीं छूट सकता । ९६.
979/29/2026gइस अपेक्षा से नित्य हूँ, इस अपेक्षा से अनित्य हूँ, ऐसे दोनों ही ठीक हैं- ऐसे (अज्ञानी) कहते हैं। अरे ! 'मैं नित्य ही हूँ' - ऐसा ज़ोर देना तो भूल गया। तो क्या रहा ? - अनादि का जो था, वो ही रहा । ९७.
989/30/2026gविचार-मनन से वस्तु प्राप्त नहीं होती है। क्योंकि ये पर्याएँ बहिर्मुखी, मन के संगवाली हैं; वस्तु अंतर्मुख-ध्रुव है । ९८.
9910/1/2026gचैतन्यदल में- असंख्य प्रदेश में - प्रसर जाने से पर्याय दिखती ही नहीं है; (अर्थात्) ऐसी पर्याय को छोड़कर, ऐसी पर्याय करूँ- ऐसा नहीं होता । पर्याय में साम्यभाव आ जाता है । ९९.
10010/2/2026gप्रश्न : "किसी जीव के अलावा, सामान्यतः सभी जीवों को मार्ग के क्रम का सेवन करना पड़ता है" (श्रीमद् राजचंद्रजी का बोल) । - इसमें क्या कहना है ? उत्तर : क्या क्रम ? कोई जीव सीधा अनुभव करके वस्तु को पकड़ लेता है। और बहुत से जीवों की परिणति चंचल होती है, इसलिए धीरे-धीरे शास्त्र आदि में रुकते रुकते इधर ढलते हैं, इसे क्रम का सेवन कहा । १००.
10110/3/2026gभगवान् की वाणी सुनने में अपना नाश होता है। जैसे स्त्री का विषय है वैसे यह भी विषय है । १०१.
10210/4/2026gअसल में बात तो यह है कि : सुनने में जो माहात्म्य आता है वह नहीं; किंतु अंदर से सहजरूप से (स्व का) माहात्म्य आना चाहिए । (बाहर में) तीव्र थकावट हो, तो माहात्म्य अंदर से ही आता है। १०२.
10310/5/2026gअपरिणाम में सदा ज़ोर आना चाहिए। परिणाम में विकल्प से हटने का और आह्लादरूप अनुभव में जाने का भाव होता है, लेकिन अधिकता इसमें नहीं, अधिकता तो त्रिकाली में ही रहनी चाहिए । १०३.
10410/6/2026gश्रवण-वाँचन आदि तो सब ऊपर-ऊपर की बातें हैं; अंदर में से सहजरूप (भाव) आना चाहिए । १०४.
10510/7/2026gयहाँ तो दातार हो जाने की बात है। यहाँ से (दूसरे उपदेशदाता से) ले लूँ, ऐसी बात ही नहीं । एकबार लाभ मिला, तो दूसरी बार भी लाभ मिल जाएगा, यह प्रत्यक्ष लाभ मिल रहा है न ! ऐसे-ऐसे करके (अज्ञानी) उसमें ही रुक जाता है। अंदर के दातार की बात तो रही नाम मात्र, और बाहर के दातार की मुख्यता !! १०५.
10610/8/2026gशास्त्र में बात आए कि बर्फ़ के संयोगसे पानी ज़्यादा ठण्डा होता है; ऐसे अधिक गुणवान् के संग में रहने से ज़्यादा लाभ होता है; - ऐसा सुननेपर, वहाँ अज्ञानी चौंट जाता है। असंग की बात छोड़ दी ! गुणहीन का संग छोड़कर गुणवान् का संग किया, परंतु असंगता रह गई । १०६.
10710/9/2026gशास्त्रों में अनेक तरह के कथन आते हैं, तो अज्ञानी इनमें उलझ जाता है। लेकिन 'निश्चय की बात मुख्य करके, निमित्त का ज्ञान करने का है' यह भूल जाता है। क्योंकि अनादि से संग का अभ्यास है न ! इससे एक संग (अशुभ) छोड़कर दूसरा संग (शुभ का) पकड़ लेता है । १०७.
10810/10/2026gअनुभव की बात तो क्या कहें !! एक दफ़ा तो बिजली के करंट के माफ़िक अंदर में उतर जाना चाहिए। जैसे करंट का काल थोड़ा, फिर भी सारा शरीर झनझना उठता है; उसी तरह असंख्य प्रदेश में आनंद-आनंद हो जाता है। पीछे शुभाशुभ विकल्प आते हैं, परंतु अनुभव में से छूटना न चाहें तो भी छूट जाते हैं। छूट जाए तो छूटो मगर 'मैं तो यह (त्रिकाली आत्मा) ही हूँ।' १०८.
10910/11/2026gसब शास्त्र पढ़ लेवें, तो भी अनुभव बिना उसका भाव ख़याल में नहीं आता । 'सब अपेक्षा तो जान लेवें,' ऐसे (अज्ञानी) उसमें (जानपने में) ही फँस जाते हैं। १०९.
11010/12/2026gत्रिकाली का ज़ोर नहीं, तो क्षणिक शुभाशुभ में पूरा का पूरा चला जाता है। क्षणिक दुःख आया, तो त्रिकाली दुःख मानने लगे; क्षणिक सुख आया, तो त्रिकाली सुख मानने लगे। और जो त्रिकाली में अपनापन हुआ, तो क्षणिक पर्याय जो योग्यतानुसार होनेवाली है वह हो, मैं उसमें नहीं खिसकता । ११०.
11110/13/2026gनिर्विकल्प अनुभव होते ही ज्ञाता द्रष्टा हो सकता है। [सिर्फ] ऐसे विकल्प से ज्ञाता मानकर, 'होनेवाला था, सो हुआ' ऐसा मानकर [ऐसे] समाधान में (जो) सुख मानता है, वह (सुख) तो जैसा : अघोरी मांस खाने में, सूअर विष्टा खाने में, पतंगा दीपक में सुख मानता है, वैसा है। निर्विकल्प अनुभव बिना धारणा में ठीक मानना, सुख मानना, यह तो कल्पना मात्र है; वास्तविक सुख नहीं । १११.
11210/14/2026gपूज्य गुरुदेवश्री ने इतना स्पष्ट कर दिया है कि, कमी नहीं है, सूक्ष्म पहलुओं का भी पूरा-पूरा खुलासा किया है। ११२.
11310/15/2026gयोग्यता हो, तो सुनते-ही सीधे अंदर में उतर जाते हैं, इसलिए कहते हैं कि 'ऐसी उनकी काललब्धि' । तो अज्ञानी कहता है कि : अरे ! पुरुषार्थ को उड़ा दिया ! पर, अरे भाई ! पुरुषार्थ इससे जुदा थोड़े ही है ?! कोई स्वच्छंदता न कर लेवे, इसलिए 'पुरुषार्थ करना' ऐसा कहा है। त्रिकाली में अपनापन होने में पुरुषार्थ होता ही है। लेकिन यह पर्याय जितना मैं नहीं हूँ, मैं तो त्रिकालीदल ही हूँ। ११३.
11410/16/2026gजो निर्विकल्पता होती है, उसमें तो पूरा जगत्, देह, विकल्प, उघाड़ (क्षयोपशम ज्ञान) आदि कुछ दिखता ही नहीं; एक खुद ही खुद दिखता है। अंदर में जाए, तो बाहर का कुछ दिखे ही नहीं। ११४.
11510/17/2026gअरे भाई ! तू अपने सारे के सारे असंख्य प्रदेश में चैतन्यमूर्ति हो, उसी में बैठे रहो न ! उठकर कहाँ जाते हो ? ११५.
11610/18/2026g'शास्त्र से ज्ञान नहीं होता' ऐसा सुने और 'बराबर है' ऐसा कहे; परंतु अंदर में (अभिप्राय में) तो ऐसा मानता है कि 'बाहर से ज्ञान आता है।' 'वाणी से लाभ नहीं' ऐसा कहे, लेकिन मान्यता में सुनने से प्रत्यक्ष लाभ होता दिखे, तो थोड़ा तो सुन लूँ, इसमें क्या नुकसान ? अरे भैया ! इसमें नुकसान ही होता है, लाभ नहीं। ऊपर से नुकसान कहे और अंदर में लाभ मानकर प्रवर्ते, यह कैसी बात ! अज्ञानी उसमें अटक जाते हैं । ११६.
11710/19/2026gप्रश्न: रुचि क्यों नहीं होती ? उत्तर : ज़रूरत दिखे, तो अंदर में आए बिना रहे ही नहीं । सुनते हैं, प्रसन्नता आदि होती है, लेकिन सुख की ज़रूरत हो, तो अंदर आवे । ज़रूरत न हो, तो वहाँ (प्रसन्नता आदि में) ही ठीक माने । लाभ है, नुकसान तो नहीं न! (- ऐसा भाव रह जाता है ।) ११७.
11810/20/2026g(जिसको) विकल्प की भूमिका में भी निर्णय नहीं होता, उसको निर्विकल्प निर्णय होने का अवकाश ही कहाँ है ? ११८.
11910/21/2026gइ.....त....नी लगन रहती है कि, मैं कब एकांत में बैठूं । एकांत में बैठने की लगन रहती है फिर-भी एकांत नहीं मिले, तो वैसे ही अंदर में एकांत बना लेता हूँ। एकांत न मिले, तो इसके लिए तड़पता नहीं । (अंगत) । ११९.
12010/22/2026gजैनदर्शन ही एक ऐसा है कि : जो वीतराग होने से दूसरे को अपने समान बना लेता है, यह इसकी मूल विशेषता है। दूसरे मतवाले शिष्य को बहुत कुछ दे देवें, किंतु पूरा तो नहीं देते, क्योंकि वे कषाययुक्त हैं । १२०.
12110/23/2026gप्रश्न : द्रव्यलिंगी इतना स्पष्ट जानकर (भी) क्यों त्रिकाली में अपनापन नहीं करता ? उत्तर : उसको सुख की ज़रूरत नहीं है। क्योंकि उसको एक समय की उघाड़-पर्याय में संतोष है, सुख लगता है, तो (वह) त्रिकाली को क्यों पकड़े ? १२१.
12210/24/2026gअसल में तो (विकल्प मात्र में) तीव्र दुःख लगना चाहिए । जो तीव्र दुःख लगे, तो सच्चे सुख के बिना संतोष हो नहीं सकता । दुःख की वेदना सुख को शोधे बिना रहती ही नहीं । १२२.
UmaralaTuesday, September 15, 2026
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