‘परिणाम योग्यता अनुसार हो जाता है; मैं वो नहीं ।’—इसमें किसी को ऐसा लगे कि, क्या परिणाम जड़ में होता है? अथवा निश्चयाभास-सा लगता है। लेकिन ऐसा कहने में तो ‘अपरिणामी’ का ज़ोर बताना है। १.
2
6/26/2026
शुद्धपर्याय भी दृष्टिअगोचर
प्रश्न : आप शुद्धपर्याय को दृष्टि की अपेक्षा से भिन्न कहते हैं या ज्ञान की अपेक्षा से? उत्तर : दृष्टि की अपेक्षा से भिन्न कहते हैं; ज्ञान की अपेक्षा से नहीं। दृष्टि करने के प्रयोजन में भिन्नता का ज़ोर दिए बिना दृष्टि अभेद नहीं होती; इसलिए दृष्टि की अपेक्षा से ही भिन्न कहते हैं। और अपनी तो यही “दृष्टिप्रधान” शैली है, सो ऐसे ही कहते हैं। २.
3
6/27/2026
ज्ञानी का सहज प्रमाण ज्ञान
निर्विकल्प होते ही अपने में से ही एक ज्ञान उघड़ता है, जो दोनों पक्षों को सहज जान लेता है, उसी को प्रमाणज्ञान कहते हैं। ।।3।।
4
6/28/2026
परिणाम और त्रिकाल अपरिणामी
‘परिणाम’ और ‘त्रिकाल अपरिणामी’—दो मिलकर ही पूर्ण एक वस्तु है, जो प्रमाण का विषय है। वेदान्ती तो केवल निष्क्रिय… निष्क्रिय कहते हैं, वे परिणाम को ही नहीं मानते हैं; तो निष्क्रिय भी जैसा है वैसा तो उनकी मान्यता में भी नहीं आता। यहाँ तो परिणाम को गौण करके निष्क्रिय कहा जाता है। ।।4।।
5
6/29/2026
नयचक्र चलाकर अखंड को जीत
एक चक्र के अनेक पासे (पहल) हैं, सभी पासे अलग-अलग डिजाइन के हैं। जब किसी एक पासे की बात चलती हो, तब दूसरे पासे की बात नहीं समझनी चाहिए। ऐसे वस्तु के अनेक धर्मों में से भिन्न-भिन्न धर्मों की बात चलती हो, तब एक को दूसरे में मिलाकर, घोटाला नहीं करना चाहिए। ।।5।।
6
6/30/2026
बहिर्तत्त्व से अंतःतत्त्व
"जब शुद्धपर्याय बहिर्तत्त्व है, ध्यान बहिर्तत्त्व है, तब ध्रुवतत्त्व अंतःतत्त्व है। जब दो घर की बात चलती हो, तब उसमें तीसरे घर की टाँग (बात) डालने से घोटाला हो जाता है।
ध्रुवतत्त्व अंतःतत्त्व है, तब शुद्धपर्याय बहिर्तत्त्व है। शुद्धपर्याय को अंतःतत्त्व कहें, तब अशुद्धपर्याय को बहिर्तत्त्व कहते हैं। अशुद्धपर्याय को अंतःतत्त्व कहें, तब कर्म को बहिर्तत्त्व कहते हैं। कर्म को अंतःतत्त्व कहें, तब नोकर्म को बहिर्तत्त्व कहते हैं। — ऐसे (अपेक्षित विवक्षानुसार) सब घटा (समझ) लेना। ६."
7
7/1/2026
सिद्धों का भी मैं सिद्ध
सिद्ध से भी मैं अधिक हूँ; क्योंकि सिद्ध तो एक समय की पर्याय है; और मैं तो ऐसी-ऐसी अनन्त पर्यायों का पिण्ड हूँ। ७.
8
7/2/2026
अड़िग चैतन्य मेरु
जैसे मेरुपर्वत अड़िग है; मैं भी वैसे-ही अड़िग हूँ। मेरु में तो परमाणु आते-जाते हैं; लेकिन मेरे में तो कुछ-भी आता-जाता नहीं—ऐसा मैं अड़िग हूँ। ८।
9
7/3/2026
आनंद से भरचक समुद्र
"‘मैं वर्तमान में ही मुक्त हूँ, आनंद की मूर्ति हूँ, आनंद से भरचक समुद्र ही हूँ’—ऐसी दृष्टि हो, तो फिर मोक्ष से भी प्रयोजन नहीं; मोक्ष हो तो हो, न हो तो भी क्या?
मेरे को तो वर्तमान में ही आनंद आ रहा है, फिर पर्याय में तो मोक्ष होगा ही। लेकिन मेरे को तो उससे भी प्रयोजन नहीं। ९।"
10
7/4/2026
बहिर्मुख परिणाम से दुःख
"कुछ करना, सो मरने बराबर है। मुझे शुरू से ही कुछ करने के भाव में मरने जैसा बोझा लगता था। शुभपरिणाम होते (तो) मैं भट्ठी में जल रहा हूँ—ऐसा लगता था।
समुद्र के जल में से एक बूँद उड़कर बाहर पड़े, तो उस बूँद को रेत चूस कर खत्म कर देगी; और यदि गर्म रेत हो, तो बूँद तुरत खत्म हो जावेगी। वैसे-ही परिणाम बाहर की ओर जाए (तो) उसमें दुःख ही दुःख है। (अंगत) १०।"
11
7/5/2026
शुद्धपर्याय भी परद्रव्य
द्रव्यदृष्टि की अपेक्षा से तो शुद्धपर्याय भी परद्रव्य है। जब मेरे अस्तित्व में वो (शुद्धपर्याय) नहीं, तो फिर राग की तो बात ही क्या? ॥११॥
12
7/6/2026
वैसा का वैसा मैं अपीरणामी
पर्याय में तीव्र अशुभपरिणाम हो या उत्कृष्ट से उत्कृष्ट शुद्धपर्याय हो, मेरे में कुछ-भी बिगाड़ सुधार नहीं होता, मैं तो वैसा का वैसा ही हूँ। ॥१२॥
13
7/7/2026
मोक्ष से भी प्रयोजन नहीं
केवलज्ञान से भी हमारे प्रयोजन नहीं; मोक्ष से भी प्रयोजन नहीं; वो तो हो ही जाता है। ॥१३॥
14
7/8/2026
ज्ञान के विषय का प्रयोजन
ज्ञान का विषय दृष्टि के विषय का प्रयोजन साधने जितना-ही लक्ष्य में लेना ठीक है; बाकी उसका प्रयोजन नहीं है। ॥१४॥
15
7/9/2026
सुनना-पढ़ना भी तब बेकार है
सुन-सुन करके मिल जाएगा, यह दृष्टि झूठी है। (कार्यसिद्धि) अपने से ही होगी। सुनना, सुनाना, पढ़ना—ये सभी बेकार हैं; ये हों, तो भले हों; लेकिन उनका खेद होना चाहिए, निषेध आना चाहिए। ॥१५॥
16
7/10/2026
वायदे में फायदा नहीं
मैं पहले तो सब सुन लूँ, जान लूँ, पीछे पुरुषार्थ करूँगा—ऐसे पीछेवाले सदा पीछे-पीछे ही रहेंगे। यहाँ तो वर्तमान इसी क्षण से ही करने की बात है। ॥१६॥
17
7/11/2026
परिणाम मात्र अभूतार्थ है
व्यवहारनय को अभूतार्थ कहने से संक्षेप में परिणाम मात्र अभूतार्थ है—ऐसा कहा है; चाहे तो परिणाम अशुभ हो, शुभ हो या शुद्ध हो। ॥१७॥
18
7/12/2026
अपने परिणाम तक अपनी सीमा
अपने परिणाम तक ही अपनी सीमा है; इससे आगे तो कोई द्रव्य जा ही नहीं सकता। १८।
19
7/13/2026
शुद्ध परिणाम भी मुझसे अलग
परिणाम अपना है; तो भी उसको आप खुद ही पलट नहीं
सकते। परिणाम में कर्ता-कर्मपने का धर्म है, इसलिए वो तो
पलटेगा ही। जब दृष्टि बाहर झुकी है, दृष्टि का प्रसार अपने को
छोड़कर बाहर में है, तो परिणाम भी बाहर झुकेगा। और यदि
दृष्टि अपने स्वभाव की ओर है, तो परिणाम भी अपनी ओर
झुकेगा।
अपने को तो परिणाम भी पलटाना नहीं है। मैं अपरिणामी
हूँ और पलटना मेरा धर्म ही नहीं है, वह तो परिणाम का धर्म
है। दृष्टि की अपेक्षा से शुद्ध परिणाम भी मेरे से अलग ही है;
ज्ञान उसको अपना अंश जान लेता है। १९।
20
7/14/2026
पात्रता का स्वरूप
प्रश्न : प्रथम पात्रता का क्या स्वरूप है?
उत्तर : अपने द्रव्य में दृष्टि को तादात्म्य करना, प्रसारना।
बाह्य में तादात्म्य कर रही दृष्टि को अपने में तादात्म्य करना,
यही प्रथम पात्रता है। २०।
21
7/15/2026
एक बार आनंद की घूँट पी ले
जब एक बार आनंद की घूँट पी ली, तब तो बार-बार
वही घूँट पीने के लिए अपनी ओर आना ही पड़ेगा। दूसरी किसी
जगह परिणति को रस ही नहीं आएगा; बार-बार अपनी ओर
आने का ही लक्ष्य रहेगा, दूसरे सब रस उड़ जाएँगे। २१।
22
7/16/2026
अनंत पुरुषार्थ का पिण्ड
‘पुरुषार्थ करूँ....पुरुषार्थ करूँ’—यह बात भी नहीं है। ‘मैं वर्तमान में ही अनंत पुरुषार्थ का पिण्ड हूँ’ (—ऐसे स्वाश्रय में) पर्याय द्रव्य की ओर ढल जाती है। इसलिए पर्याय की अपेक्षा से पुरुषार्थ करने का कथन आता है। २२.
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7/17/2026
भगवान होना नहीं भगवान हूँ
‘मैं स्वयम् ही वर्तमान में भगवान हूँ’—भगवान होना भी क्या है? अपने स्वभाव में दृष्टि का प्रसार होते, पर्याय मेरी ओर झुकते-झुकते, पर्याय में केवलज्ञान–सिद्धदशादि होती ही हैं; परंतु मुझे तो इससे भी प्रयोजन नहीं है। २३.
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7/18/2026
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दृष्टि का विषयभूत द्रव्य एकांत ध्रुव ही है। पर्याय की अपेक्षा से पर्याय एकांत अनित्य ही है। ॥३२॥
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7/27/2026
33
प्रश्न : निर्विकल्प उपयोग में कैसा आनंद आता है?
उत्तर : निर्विकल्प उपयोग के सुख की तो क्या बात कहें!!
लेकिन समझाने के तौर-से जैसे गन्ने के रस की घूँट पीते हैं, वैसे आनंद की घूँट एक के बाद एक चलती ही रहती है; उसमें से निकलने का भाव ही नहीं आता। ॥३३॥
34
7/28/2026
34
अशुभपरिणाम के काल में इस ओर का झुकाव मंद होता है। शुभपरिणाम के काल में इस ओर का थोड़ा ज्यादा झुकाव होता है। दृष्टि का झुकाव तो वैसा का वैसा ही है। लड़ाई के काल में बाहर लड़ाई की क्रिया होती है और राग में अशुभराग की क्रिया होती है; पर मैं तो मेरे में ही अचल रहता हूँ, मेरे में तो उस समय भी राग की क्रिया का अभाव है। ॥३४॥
35
7/29/2026
35
"मैं अडिग हूँ, किसी से डिगनेवाला नहीं हूँ" — ऐसा निश्चय होने पर, निर्णय का फल आनंद आना चाहिए; तब ही निर्णय सच्चा है। ॥३५॥
36
7/30/2026
36
हर समय विकल्प से भेदज्ञान करना नहीं पड़ता, वो तो सहजरूप से हो जाता है। ॥३६॥
37
7/31/2026
37
दृष्टि द्रव्य में तादात्म्य हो जाने पर भी चारित्रपरिणति कुछ च्युत होकर पर की ओर चली जाती है, तो भी स्वरूपाचरण की च्युति नहीं होती। ॥३७॥
38
8/1/2026
38
(स्वरूप की) दृष्टि होनेपर भी चारित्रगुण की योग्यता ही ऐसी होने से चारित्रगुण पूरा (शुद्ध) नहीं परिणम जाता।
श्रद्धागुण का स्वभाव ऐसा है कि एक ही क्षण में द्रव्य में पूरा का पूरा व्याप्त हो जाता है। चारित्रगुण का स्वभाव ऐसा है कि वह क्रम-क्रम से ही पूरा होता है—ऐसे दोनों गुणों के स्वभाव ही अलग-अलग हैं। ॥३८॥
39
8/2/2026
29
जब दृष्टि अपने स्वरूप में तादात्म्य होती है तो थोड़े काल तक राग आता तो है, लेकिन वह लँगड़ा हो जाता है, उसको आधार नहीं रहता। ॥३९॥
40
8/3/2026
40
मैं तो कभी-भी नहीं हिलनेवाला खूँटा हूँ। परिणाम आते हैं और जाते हैं, मगर मैं तो खूँटे की तरह अचलित ही रहता हूँ। ॥४०॥
41
8/4/2026
41
बहिर्मुख होने से ज्ञान खिलता नहीं और अंतर्मुख होने से भीतर से ही केवलज्ञान प्रकट हो जाता है। अपनी ओर ही देखने की बात है। ॥४१॥
42
8/5/2026
42
(एक जिज्ञासु :) आत्मा को ही पकड़ने की बात है?
(भाईश्री :) पकड़ना क्या? "मैं तो स्वयं हूँ ही।" पकड़ना-फकड़ना सब परिणाम की अपेक्षा से कहने में आता है। परिणाम अपनी ओर झुका, तो परिणाम की अपेक्षा से आत्मा को पकड़ा—ऐसा कहने में आता है। ॥४२॥
43
8/6/2026
43
अपने द्रव्य में दृष्टि तादात्म्य होते ही ज्ञान प्रमाण हो जाता है; तब ज्ञान सभी बातें (यथार्थपने से) जान लेता है। ॥४३॥
44
8/7/2026
44
जब अपनी ओर से खिसक कर बाहर जाने का ही निषेध है, तो अशुभ में जाकर पर में रस पड़ जावे तब तो दृष्टि अपने द्रव्य में रही ही कहाँ?—वह तो पर में चली गई। ॥४४॥
45
8/8/2026
45
“अनेकांत पण सम्यक् एकांत ऐवा निजपदनी प्राप्ति सिवाय अन्य हेतुए उपकारी नथी” — श्रीमद्जी का यह वाक्य मुझे बहुत प्रिय लगता है। ॥४५॥
46
8/9/2026
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दूसरे से सुनना-माँगना सब पामरता है, दीनता है, भिखारीपना है। मेरे में क्या कमी है, जो मैं दूसरे से माँगूँ?? मैं तो स्वयं ही परिपूर्ण हूँ। ४६.
47
8/10/2026
47
“अहो! जे भावे तीर्थंकरगोत्र बंधाय ते भाव पण नुकसान कर्ता छे”-- यह बात कहने की किसकी ताकत है? - यह तो गुरुदेवश्री की ही सामर्थ्य है! ४७.
48
8/11/2026
48
तीर्थंकर की दिव्यध्वनि से भी लाभ नहीं होता, तो फिर और किससे लाभ हो ? वह भी अपने को छोड़कर, एक भिन्न विषय ही है। ४८.
49
8/12/2026
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विकल्प से और मन से किया हुआ निर्णय सच्चा नहीं। अपनी ओर दृष्टि को तादात्म्य करनेपर ही अपने से किया हुआ निर्णय सच्चा होता है। पहले विकल्प से-अनुमान से निर्णय हो, उसमें भी लक्ष्य तो अंतर में ढलने का ही होना चाहिए। ४९.
50
8/13/2026
50
मैं तो अडिग हूँ, किसी से डिगनेवाला नहीं हूँ। जैसे इस देहाकार में स्थित आकाश अडिग है, हिलता-चलता नहीं; वैसे-ही मैं भी अडिग हूँ। ५०.
51
8/14/2026
51
अंतर में आनंद की घूँट पीते हुए बाहर में आना गमे (रुचे) ही किसको ?? बाहर में आते-ही तो बोझा लगता है। ५१.